उज्जैन सिंहस्थ:
हजारों वर्ष पहले, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब अमृत कलश प्राप्त हुआ। अमृत को लेकर देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष छिड़ गया। मान्यता है कि इस संघर्ष के दौरान अमृत की कुछ बूंदें चार पवित्र स्थलों पर गिरीं—हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन।
उज्जैन की पवित्र भूमि पर गिरी अमृत बूंदों ने इस नगर को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया। तभी से यहां क्षिप्रा नदी के तट पर सिंहस्थ महापर्व मनाया जाने लगा। जब गुरु (बृहस्पति) सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब उज्जैन में सिंहस्थ का आयोजन होता है।
सदियों से संत, महात्मा, नागा साधु और करोड़ों श्रद्धालु यहां एकत्र होकर पवित्र स्नान करते हैं और धर्म, संस्कृति तथा आध्यात्मिकता का संदेश फैलाते हैं। सिंहस्थ केवल एक मेला नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन परंपरा, आस्था और एकता का जीवंत प्रतीक है।
आज भी जब उज्जैन में सिंहस्थ का आयोजन होता है, तो ऐसा लगता है मानो इतिहास, श्रद्धा और सनातन संस्कृति एक साथ जीवंत हो उठी हो।
यही है उज्जैन सिंहस्थ की गौरवशाली इतिहास।