उत्सव का शुभारंभ: धर्म ध्वजा (पताका) फहराने के साथ ही उस स्थान पर उत्सव अथवा अनुष्ठान की विधिवत शुरुआत मानी जाती है।
सकारात्मक ऊर्जा और आमंत्रण: यह देवताओं के आह्वान, सकारात्मक ऊर्जा के संचार और समस्त विघ्नों को दूर करने का प्रतीक है।
संकल्प: यह अनुष्ठान को निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए आयोजकों और श्रद्धालुओं द्वारा लिए गए सामूहिक संकल्प को दर्शाता है।
भूमि व वेदी पूजन: ध्वज स्तंभ की स्थापना से पूर्व संबंधित स्थल का शुद्धिकरण और पूजन किया जाता है।
ध्वज दंड स्थापना: शुद्ध काष्ठ (लकड़ी), बांस या धातु के स्तंभ को स्थापित किया जाता है।
मंत्रोच्चार एवं अभिषेक: वैदिक अथवा आगम परंपरा के अनुसार पवित्र मंत्रों के जाप के साथ ध्वज को पंचामृत या गंगाजल से शुद्ध किया जाता है।
ध्वजारोहण (फहराना): निर्धारित शुभ मुहूर्त में शंखनाद, नगाड़े और जयकारों के बीच मुख्य यजमान या संतों द्वारा धर्म ध्वजा फहराई जाती है।
आरती व प्रसाद वितरण: ध्वज की आरती उतारी जाती है और उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है।
धर्म ध्वजा: रेशमी या सूती वस्त्र (प्रतीक चिह्नों जैसे ॐ, स्वस्तिक, त्रिशूल या कलश से सुसज्जित)।
पूजन सामग्री: रोली, अक्षत, कलावा (मौली), कुमकुम, चंदन, धूप, दीप, अगरबत्ती, फल, फूल एवं नैवेद्य।
जल पात्र: कलश, गंगाजल, पंचामृत एवं आम के पत्ते।